मैं कौन हूँ ? क्या यह हाथ मैं हूँ जो की बोर्ड पर टाईप कर रहा है ? नहीं नहीं क्यों की यह हाथ तो पराधिन है यह मन के द्वारा संचालित हो रहा है । इसको अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है । इसको अपनी ही पता नही की यह कौन है ? इसे तो मैं जान रहा हूँ की यह हाथ है । यह हाथ अपने आपको नही देख रही है परन्तु इसे मैं देख रहा हूँ तो मैं कौन हूँ ?
इस हाथ को आँखे देख रही है तो क्या यह आँख मैं हूँ ? नहीं नहीं यह आँख मैं नहीं हूँ । क्योंकी मैं यह जान रहा हूँ की यह आँख देख रहा है । मैं आँख को देख रहा हूँ, निद्रावस्था में जब आँख की कोई काम नही रहती है फिर भी आँखों के बिना भी मैं दृश्य को देख रहा होता हूँ । तो आँखों के द्वारा कौन देख रहा है और आँखों के बिना भी कौन देख रहा है वही मैं हूँ, तो मैं कौन हूँ ?
बोले, मन देख रहा है, आँखों के द्वारा और बिना आखों के, तो क्या मैं मन हूँ ? नहीं नहीं, मन पल-पल बदलता रहता है और मैं यह भी जान रहा हूँ कि मन देख रहा है, तो मन से अलग हुआ और मैं नहीं बदलता, मन में जो विचार चल रहे है वो सही है या गलत है यह भी मैं जानता हूँ, तो मन देख रहा है, सही देख रहा है कि गलत देख रहा है उसे भी मैं जान रहा हूँ, तो क्या वहीं मैं हूँ जो मन के हरकत, विचार, क्रिया कलाप को जान रहा हूँ ?
बोले, मन सही देख रहा है या गलत देख रहा है, यह निर्णय तो बुद्धि कर रही है, क्या मैं बुद्धि हूँ, नही नही मैं निर्णय नहीं हूँ, मैं यह जान रहा हूँ की बुद्धि निर्णय ले रहा है, को मन जो आँखों के द्वारा देख रहा है वो गलत है कि सही है, उसे देखना है कि नही देखना है यह निर्णय बुद्धि कर रहा है, मैं उस बुद्धि को भी जान रहा हूँ, तो मैं कौन हूँ, गहरी निंद में तो बुद्धि मूढता को प्राप्त हो जाती है, मन सुन्न हो जाता है, तब किसी का कुछ भान नहीं होता, परन्तु उसको भी जानने वाला मैं तो हूँ कि कुछ नहीं देखा, वो मैं कौन हूँ ?
इस हाथ को आँखे देख रही है तो क्या यह आँख मैं हूँ ? नहीं नहीं यह आँख मैं नहीं हूँ । क्योंकी मैं यह जान रहा हूँ की यह आँख देख रहा है । मैं आँख को देख रहा हूँ, निद्रावस्था में जब आँख की कोई काम नही रहती है फिर भी आँखों के बिना भी मैं दृश्य को देख रहा होता हूँ । तो आँखों के द्वारा कौन देख रहा है और आँखों के बिना भी कौन देख रहा है वही मैं हूँ, तो मैं कौन हूँ ?
बोले, मन देख रहा है, आँखों के द्वारा और बिना आखों के, तो क्या मैं मन हूँ ? नहीं नहीं, मन पल-पल बदलता रहता है और मैं यह भी जान रहा हूँ कि मन देख रहा है, तो मन से अलग हुआ और मैं नहीं बदलता, मन में जो विचार चल रहे है वो सही है या गलत है यह भी मैं जानता हूँ, तो मन देख रहा है, सही देख रहा है कि गलत देख रहा है उसे भी मैं जान रहा हूँ, तो क्या वहीं मैं हूँ जो मन के हरकत, विचार, क्रिया कलाप को जान रहा हूँ ?
बोले, मन सही देख रहा है या गलत देख रहा है, यह निर्णय तो बुद्धि कर रही है, क्या मैं बुद्धि हूँ, नही नही मैं निर्णय नहीं हूँ, मैं यह जान रहा हूँ की बुद्धि निर्णय ले रहा है, को मन जो आँखों के द्वारा देख रहा है वो गलत है कि सही है, उसे देखना है कि नही देखना है यह निर्णय बुद्धि कर रहा है, मैं उस बुद्धि को भी जान रहा हूँ, तो मैं कौन हूँ, गहरी निंद में तो बुद्धि मूढता को प्राप्त हो जाती है, मन सुन्न हो जाता है, तब किसी का कुछ भान नहीं होता, परन्तु उसको भी जानने वाला मैं तो हूँ कि कुछ नहीं देखा, वो मैं कौन हूँ ?